सर्जन की चिड़ियाँ करें, तोपों पर निर्माण॥

-डॉ. सत्यवान सौरभ

बस यूं ही बदनाम है, सड़क-गली-बाजार।

लूट रहे हैं द्रौपदी, घर-आँगन-दरबार॥

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कोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।

भीतर-भीतर है छुपी, सबके कोई पीर॥

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लाख चला ले आदमी, यहाँ ध्वंस के बाण॥

सर्जन की चिड़ियाँ करें, तोपों पर निर्माण॥

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अगर विभीषण हो नहीं, कर पाते क्या नाथ।

सोने की लंका जली, अपनों के ही हाथ॥

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एकलव्य जब तक करे, स्वयं अंगूठा दान।

तब तक अर्जुन ही रहे, योद्धा एक महान॥

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देख सीकरी आगरा, ‘सौरभ’ है हैरान।

खाली है दरबार सब, महल पड़े वीरान॥

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बन जाते हैं शाह वो, जिनको चाहे राम।

बैठ तमाशा देखते, बड़े-बड़े जो नाम

डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

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