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ज्ञानचंद मेहता
राहुल गांधी जी बिहार आ रहे हैं, तो कोई गांधी जी चंपारण आ रहे हैं, इसमें नया क्या है? सिर्फ यह कि गंगा किनारे के सदाकत आश्रम की पुरातन गंध, सीलन और सड़ांध को ढाक कर इंदिरा भवन कह कर नया होने का अहसास दिलाएंगे। यानी, कांग्रेस कार्यालय के इंदिरा भवन होने की नाटकीयता से कांग्रेस पुनर्जीवन प्राप्त कर सकेगा ?
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1990 या उसके बाद लालू यादव ने जिस कांग्रेस को गंगा में भींगो-भींगो कर मारा है और किनारे बांस घाट पर घसीट – घसीट कर सुखाया है, उस कांग्रेस को उम्मीद कैसे है कि लालू उन्हें गंगा का जल ग्रहण कर लेने देंगे!
अब न कांग्रेस की चलने वाली है न लालू की। महाकुंभ मेले के दौर में इन दोनों जैसी छद्मबाज सेकुलर पार्टियों की गारंटी समाप्त हो चुकी है।